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REST API Versioning: A Practical Guide

REST API Versioning: A Practical Guide

What is API versioning, really? API versioning is a contract-management strategy: a way to change your API's shape — fields, behavior, response format — without breaking clients who haven't updated yet. The moment your API has more than one consumer you don't fully control — a mobile app sitting in app-store review, a partner integration, a frontend deployed separately from the backend — you can no longer just "change the API." You need a way to run two shapes of the contract simultaneously, so existing clients keep working while new clients get the updated behavior.

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भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — Paper-III, LL.B. Semester-II

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) — Paper-III, LL.B. Semester-II

प्रश्न BNS 2023 (Bharatiya Nyaya Sanhita) की धाराओं पर आधारित हैं, पुरानी IPC 1860 पर नहीं। इसलिए हर उत्तर में BNS धारा संख्या का प्रयोग किया गया है (साथ में पुरानी IPC धारा भी कोष्ठक में, ताकि आप दोनों को जोड़कर समझ सकें)। Leading case हर जगह सबसे relevant बिंदु पर रखा गया है। कठिन शब्दों के आगे English कोष्ठक में है।

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Constitutional Law of India-II (अनुच्छेद 245–395)

Constitutional Law of India-II (अनुच्छेद 245–395)

भारतीय संविधान का **भाग XI, अध्याय I (Art. 245–255)** संघ (Union) और राज्यों (States) के बीच **विधायी शक्तियों (legislative powers)** का बँटवारा करता है। यह वितरण दो आधारों पर होता है — **क्षेत्रीय (territorial)** और **विषयगत (subject-matter)**।

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Contract Law-II (Indian Contract Act, NI Act 1881 & Specific Relief Act 1963)

Contract Law-II (Indian Contract Act, NI Act 1881 & Specific Relief Act 1963)

LL.B. Semester-II — प्रश्नोत्तर (Model Answers) > Note (टिप्पणी): हर उत्तर में महत्वपूर्ण **Leading Cases** को उसी बिंदु पर रखा गया है जहाँ वे सबसे ज़्यादा marks दिलाते हैं (definition के बाद, या rights/liability वाले भाग में) — पूरी list के अंत में नहीं। कठिन हिंदी शब्दों के आगे अंग्रेज़ी (English) शब्द कोष्ठक में दिया गया है।

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मानव-वध, हत्या, उपहति, व्यपहरण, संपत्ति के विरुद्ध अपराध एवं मानहानि — BNS 2023 के परिप्रेक्ष्य में

मानव-वध, हत्या, उपहति, व्यपहरण, संपत्ति के विरुद्ध अपराध एवं मानहानि — BNS 2023 के परिप्रेक्ष्य में

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 को प्रतिस्थापित कर **भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023** दिनांक 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुई। परीक्षा हेतु ध्यातव्य है कि 2025 से इस प्रश्न-पत्र के उत्तर पुरानी IPC धाराओं से नहीं, अपितु BNS की नई धाराओं से लिखे जाने चाहिए। शरीर के विरुद्ध अपराधों (मानव वध, हत्या, उपहति, व्यपहरण) से लेकर संपत्ति के विरुद्ध अपराधों (चोरी से डकैती तक की क्रमिक शृंखला) और अंततः प्रतिष्ठा के विरुद्ध अपराध (मानहानि) तक का क्रमबद्ध, केस-आधारित अध्ययन प्रस्तुत है।

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म.प्र. भू-राजस्व प्रशासन एवं किरायेदार संरक्षण : भू-राजस्व संहिता, 1959 तथा स्थान नियंत्रण अधिनियम, 1961 का अध्ययन

म.प्र. भू-राजस्व प्रशासन एवं किरायेदार संरक्षण : भू-राजस्व संहिता, 1959 तथा स्थान नियंत्रण अधिनियम, 1961 का अध्ययन

**Assignment शीर्षक:** राजस्व प्रशासन का पदसोपान, भूमिस्वामी के अधिकार, नामांतरण एवं किरायेदार की बेदखली — एक विश्लेषणात्मक अध्ययन मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 ने राज्य में प्रचलित जमींदारी-मालगुजारी की भिन्न-भिन्न काश्त-व्यवस्थाओं को समाप्त कर एक एकीकृत भू-प्रशासन ढाँचा स्थापित किया। इसकी आधारशिला है धारा 57 का सिद्धांत —

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अपकृत्यीय (Tort) दायित्व के सिद्धांत एवं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम(Consumer Protection Act), 2019 : एक तुलनात्मक अध्ययन

अपकृत्यीय (Tort) दायित्व के सिद्धांत एवं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम(Consumer Protection Act), 2019 : एक तुलनात्मक अध्ययन

अपकृत्य विधि (Tort Law) एवं उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 उपेक्षा, कठोर एवं आत्यंतिक दायित्व, प्रतिनिहित दायित्व तथा उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग — निर्णीत वादों सहित

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केंद्र-राज्य संबंध एवं आपातकालीन उपबंध : भारतीय संविधान का संघीय ढाँचा एवं संकटकालीन तंत्र

केंद्र-राज्य संबंध एवं आपातकालीन उपबंध : भारतीय संविधान का संघीय ढाँचा एवं संकटकालीन तंत्र

भारतीय संविधान एक **अर्ध-संघीय (quasi-federal)** ढाँचा स्थापित करता है, जिसमें शांतिकाल में संघ व राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण होता है, परंतु संकट के समय संविधान स्वयं को **एकात्मक ढाँचे** में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। भाग XI (अनुच्छेद 245-263) विधायी, प्रशासनिक व वित्तीय संबंधों की रूपरेखा देता है; भाग XIII (अनुच्छेद 301-307) आर्थिक एकता सुनिश्चित करता है; भाग XIV (308-323) लोक सेवाओं की सुरक्षा करता है; भाग XVIII (352-360) आपातकालीन शक्तियों का प्रावधान करता है; और अनुच्छेद 368 संविधान की जीवंतता बनाए रखने हेतु संशोधन-प्रक्रिया देता है, जिसे केशवानंद भारती के **मूल ढाँचा सिद्धांत** ने सीमाबद्ध किया। प्रस्तुत असाइनमेंट में इन सभी विषयों का क्रमबद्ध, केस-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत है।

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विशिष्ट संविदाएँ एवं परक्राम्य लिखत : भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 तथा परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 का अध्ययन

विशिष्ट संविदाएँ एवं परक्राम्य लिखत : भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 तथा परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 का अध्ययन

**विषय (Paper-I):** संविदा विधि-II **(भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 — धारा 124-238 + परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 + विशिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963)** **Assignment शीर्षक:** विशिष्ट संविदाएँ (क्षतिपूर्ति, गारंटी, उपनिधान, गिरवी, अभिकरण) एवं परक्राम्य लिखत — एक विश्लेषणात्मक अध्ययन

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