विषय-सूची (Table of Contents)

  1. प्रस्तावना
  2. अध्याय 1 — संघ-राज्य विधायी संबंध (Art. 245-255)
  3. अध्याय 2 — व्यापार, वाणिज्य एवं समागम की स्वतंत्रता (Art. 301-307)
  4. अध्याय 3 — संघ एवं राज्य के अधीन सेवाएँ (Art. 308-323)
  5. अध्याय 4 — निर्वाचन आयोग (Art. 324)
  6. अध्याय 5 — आपातकालीन प्रावधान (Art. 352, 356, 360)
  7. अध्याय 6 — संविधान संशोधन एवं मूल ढाँचा सिद्धांत (Art. 368)
  8. निष्कर्ष
  9. परीक्षा-दृष्टि तालिका
  10. संदर्भ ग्रंथ सूची

1. प्रस्तावना

भारतीय संविधान एक अर्ध-संघीय (quasi-federal) ढाँचा स्थापित करता है, जिसमें शांतिकाल में संघ व राज्यों के बीच शक्तियों का वितरण होता है, परंतु संकट के समय संविधान स्वयं को एकात्मक ढाँचे में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है। भाग XI (अनुच्छेद 245-263) विधायी, प्रशासनिक व वित्तीय संबंधों की रूपरेखा देता है; भाग XIII (अनुच्छेद 301-307) आर्थिक एकता सुनिश्चित करता है; भाग XIV (308-323) लोक सेवाओं की सुरक्षा करता है; भाग XVIII (352-360) आपातकालीन शक्तियों का प्रावधान करता है; और अनुच्छेद 368 संविधान की जीवंतता बनाए रखने हेतु संशोधन-प्रक्रिया देता है, जिसे केशवानंद भारती के मूल ढाँचा सिद्धांत ने सीमाबद्ध किया। प्रस्तुत असाइनमेंट में इन सभी विषयों का क्रमबद्ध, केस-आधारित विश्लेषण प्रस्तुत है।

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2. अध्याय 1 — संघ-राज्य विधायी संबंध (अनुच्छेद 245-255)

2.1 क्षेत्रीय विस्तार (Art. 245)

संसद सम्पूर्ण भारत या उसके किसी भाग के लिए विधि बना सकती है, तथा भारत से युक्तियुक्त संबंध (nexus) होने पर क्षेत्रातीत विधान (extra-territorial legislation) की शक्ति भी रखती है। राज्य विधानमंडल केवल अपने राज्य के लिए विधि बना सकता है।

2.2 विषय-वितरण — तीन सूचियाँ (Art. 246)

सूची विषय-संख्या (मूलतः) उदाहरण विधि कौन बनाए
संघ सूची 97 रक्षा, विदेश, रेल, बैंकिंग केवल संसद
राज्य सूची 66 पुलिस, लोक-व्यवस्था, कृषि, भूमि सामान्यतः राज्य
समवर्ती सूची 47 शिक्षा, वन, विवाह, श्रम दोनों

प्रधानता का क्रम: संघ सूची > समवर्ती सूची > राज्य सूची। अवशिष्ट विषय (धारा 248) संसद के अधिकार में हैं (उदा. साइबर विधि)।

2.3 राज्य-सूची पर संसद की शक्ति — पाँच अपवाद

  1. अनुच्छेद 249: राज्यसभा का 2/3 बहुमत से संकल्प — 1 वर्ष हेतु राष्ट्रहित में
  2. अनुच्छेद 250: राष्ट्रीय आपात प्रवर्तन में
  3. अनुच्छेद 252: दो या अधिक राज्यों की सहमति से
  4. अनुच्छेद 253: अंतरराष्ट्रीय संधि/करार के पालन हेतु
  5. अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन के दौरान

2.4 विरोध की स्थिति (Art. 254) एवं न्यायिक व्याख्या के सिद्धांत

समवर्ती विषय पर संघ-विधि व राज्य-विधि में टकराव होने पर संघ विधि मान्य होती है, राज्य विधि विरोध की सीमा तक शून्य (अपवाद — Art. 254(2) राष्ट्रपति की अनुमति से आरक्षित राज्य-विधि)। तत्व और सार का सिद्धांत (pith & substance) — विधि का सार जिस सूची में हो, आनुषंगिक अतिक्रमण से वह अवैध नहीं होती (Prafulla Kumar v. Bank of Commerce, Khulna, 1947)। छद्म विधायन (colourable legislation) — जो प्रत्यक्षतः नहीं किया जा सकता, वह परोक्षतः भी नहीं (K.C. Gajapati Narayan Deo, 1953)।


3. अध्याय 2 — व्यापार, वाणिज्य एवं समागम की स्वतंत्रता (Art. 301-307)

3.1 सामान्य सिद्धांत

भाग XIII का उद्देश्य भारत को एक एकल आर्थिक इकाई (single economic unit) बनाना है। अनुच्छेद 301 घोषित करता है — भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र व्यापार, वाणिज्य और समागम स्वतंत्र होगा। परंतु यह स्वतंत्रता निरपेक्ष नहीं — अनुच्छेद 302-304 इसे नियमित करते हैं: संसद लोकहित में निर्बंधन लगा सकती है (302); राज्य-राज्य के बीच विभेद वर्जित (303, माल की कमी में संसद अपवाद बना सकती है); राज्य बाहरी माल पर वैसा ही कर लगा सकता है जैसा अपने माल पर (304(a)); राज्य लोकहित में युक्तियुक्त निर्बंधन लगा सकता है परंतु विधेयक पर राष्ट्रपति की पूर्व मंजूरी आवश्यक (304(b))।

🔴 लीडिंग केस : Atiabari Tea Co. Ltd. बनाम असम राज्य, 1961 AIR 232

(core topic — बार-बार परीक्षा में पूछा गया है, 2026 में भी प्रबल संभावना)

तथ्य: असम राज्य ने चाय के सड़क/जलमार्ग परिवहन पर कर आरोपित किया। चाय व्यवसायियों ने इसे अनुच्छेद 301 के विरुद्ध चुनौती दी।

विवाद्यक: क्या माल के परिवहन पर लगाया गया कर अनुच्छेद 301 के अंतर्गत व्यापार की स्वतंत्रता का उल्लंघन है?

निर्णय: सर्वोच्च न्यायालय ने कर को असंवैधानिक घोषित किया।

प्रतिपादित सिद्धांत: जो कर व्यापार, वाणिज्य या समागम के प्रवाह को प्रत्यक्षतः व तुरंत (directly and immediately) बाधित करे, वह अनुच्छेद 301 का उल्लंघन है, चाहे वह कर विभेदकारी हो या न हो। इसके पश्चात Automobile Transport, राजस्थान (1962) में प्रतिपूरक कर (compensatory tax) का अपवाद विकसित हुआ — सुविधा के बदले शुल्क अनुच्छेद 301 का उल्लंघन नहीं। बाद में Jindal Stainless बनाम हरियाणा राज्य (2017, 9-न्यायाधीश पीठ) ने compensatory tax का सिद्धांत समाप्त कर दिया और स्पष्ट किया कि कर तब तक वैध है जब तक वह विभेदकारी न हो।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 301 पूर्ण स्वतंत्रता नहीं, बल्कि विनियमित स्वतंत्रता देता है — नियम स्वतंत्रता है, निर्बंधन अपवाद, और विभेद वर्जित है।


4. अध्याय 3 — संघ एवं राज्य के अधीन सेवाएँ (Art. 308-323)

अनुच्छेद 310 प्रसादपर्यन्त सिद्धांत (doctrine of pleasure) स्थापित करता है, परंतु अनुच्छेद 311 सिविल सेवकों को मनमानी बर्खास्तगी से दो कवच देता है — (i) अधीनस्थ प्राधिकारी द्वारा पदच्युति नहीं (311(1)); (ii) आरोपों की सूचना व सुनवाई के युक्तियुक्त अवसर के बिना पदच्युति/निष्कासन/पंक्ति-अवनति नहीं (311(2))। अपवाद: आपराधिक दोषसिद्धि पर, जाँच व्यवहार्य न होने पर (कारण लेखबद्ध), राष्ट्र-सुरक्षा हेतु जाँच समीचीन न होने पर।

🔴 लीडिंग केस : पी.एल. धींगरा बनाम भारत संघ, AIR 1958 SC 36

(2025 में पूछा गया — दोहराव की प्रबल संभावना, दोहरा परीक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण)

तथ्य: धींगरा रेलवे में स्थायी लिपिक थे, अस्थायी (officiating) उच्च पद पर पदोन्नत हुए थे। प्रतिकूल टिप्पणियों के कारण उन्हें बिना विभागीय जाँच के मूल पद पर प्रत्यावर्तित (revert) कर दिया गया। उन्होंने इसे अनुच्छेद 311 के अंतर्गत "दण्ड" बताते हुए चुनौती दी।

विवाद्यक: क्या प्रत्येक प्रत्यावर्तन या सेवा-समाप्ति अनुच्छेद 311 के अर्थ में "दण्ड" है?

निर्णय: नहीं। अस्थायी पद से प्रत्यावर्तन दण्ड नहीं है, यदि कर्मचारी उस पद का अधिकार-स्वरूप धारक नहीं था और प्रत्यावर्तन से अर्जित लाभ नहीं छीने गए।

प्रतिपादित सिद्धांत: "दण्ड" के निर्धारण हेतु दोहरा परीक्षण: (1) क्या पद धारण करने का अधिकार था? (2) क्या आदेश के दण्डात्मक परिणाम (ज्येष्ठता/वेतन की हानि, कलंक) हुए? इनमें से किसी का उत्तर हाँ हो तो अनुच्छेद 311 की जाँच-सुनवाई अनिवार्य है।


5. अध्याय 4 — निर्वाचन आयोग (Art. 324)

अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन व नियंत्रण की शक्ति देता है।

🔴 लीडिंग केस : टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ, (1995) 4 SCC 611

तथ्य: निर्वाचन आयोग को बहु-सदस्यीय (मुख्य निर्वाचन आयुक्त + 2 निर्वाचन आयुक्त) बनाया गया, निर्णय बहुमत से होने थे। तत्कालीन CEC शेषन ने चुनौती दी कि CEC सर्वोच्च है, अन्य आयुक्त अधीनस्थ हैं।

निर्णय: संबंधित अधिनियम वैध घोषित; CEC अन्य आयुक्तों से श्रेष्ठ नहीं, तीनों समान हैं; आयोग एक सामूहिक निकाय है और निर्णय बहुमत से लिए जाते हैं। CEC को केवल पदच्युति-संरक्षण का विशेष कवच प्राप्त है।

प्रतिपादित सिद्धांत: अनुच्छेद 324 संस्था (आयोग) को शक्ति देता है, व्यक्ति (CEC) को नहीं; आयोग की स्वतंत्रता संस्थागत प्रकृति की है।


6. अध्याय 5 — आपातकालीन प्रावधान (अनुच्छेद 352, 356, 360)

6.1 राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352)

आधार: युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह (44वें संशोधन, 1978 द्वारा "आंतरिक अशांति" के स्थान पर)। प्रक्रिया: मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर राष्ट्रपति की उद्घोषणा; एक माह में दोनों सदनों से विशेष बहुमत से अनुमोदन। प्रभाव: संघ को राज्य-विषयों पर निर्देश व संसद को विधि-शक्ति (Art. 353); अनुच्छेद 19 का स्वतः निलंबन केवल युद्ध/बाह्य आक्रमण में (Art. 358); अन्य मूल अधिकारों का प्रवर्तन निलंबित हो सकता है (Art. 359), परंतु अनुच्छेद 20-21 कभी नहीं (44वें संशोधन के बाद)।

6.2 राज्य आपात / राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356)

आधार: राज्यपाल के प्रतिवेदन या अन्यथा — राज्य का शासन संविधान के अनुसार नहीं चल सकता। प्रक्रिया: दो माह में संसद का अनुमोदन; 6-6 माह विस्तार; अधिकतम 3 वर्ष। प्रभाव: राज्य कार्यपालिका राष्ट्रपति के हाथ में; विधायी शक्तियाँ संसद को; उच्च न्यायालय अप्रभावित।

6.3 वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)

आधार: भारत या उसके किसी भाग की वित्तीय स्थिरता/साख संकट में होना। प्रभाव: राज्यों को वित्तीय निर्देश; सरकारी सेवकों (न्यायाधीशों सहित) के वेतन में कटौती संभव। आज तक कभी लागू नहीं हुआ।

🔴 लीडिंग केस : एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, AIR 1994 SC 1918

(2025 में नहीं पूछा गया → 2026 का सबसे बड़ा दावेदार; 9-न्यायाधीश पीठ का निर्णय)

तथ्य: कर्नाटक के मुख्यमंत्री एस.आर. बोम्मई की सरकार को बहुमत खोने का हवाला देकर अनुच्छेद 356 से बर्खास्त किया गया — बिना सदन में शक्ति-परीक्षण (floor test) कराए। साथ ही मेघालय, नागालैंड तथा बाबरी विध्वंस के पश्चात तीन भाजपा-शासित राज्यों में राष्ट्रपति शासन की वैधता का प्रश्न भी इसी वाद में जुड़ा।

विवाद्यक: क्या अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक पुनर्विलोकन योग्य है? सरकार के बहुमत की परीक्षा कहाँ की जानी चाहिए?

निर्णय (9-न्यायाधीश पीठ):

  1. अनुच्छेद 356 की उद्घोषणा न्यायिक पुनर्विलोकन योग्य है — दुर्भावना या असंगत आधार पर रद्द हो सकती है।
  2. सरकार के बहुमत की परीक्षा सदन के पटल (floor test) पर होनी चाहिए, राज्यपाल की व्यक्तिपरक राय से नहीं।
  3. संसद के अनुमोदन से पहले विधानसभा भंग नहीं की जा सकती।
  4. धर्मनिरपेक्षता संविधान के मूल ढाँचे का भाग है; धर्मनिरपेक्षता-विरोधी कार्य करने वाली राज्य सरकार के विरुद्ध अनुच्छेद 356 का प्रयोग उचित है।

प्रतिपादित सिद्धांत: संघवाद व लोकतंत्र संविधान के मूल ढाँचे के अंग हैं; अनुच्छेद 356 अंतिम उपाय (last resort) है, नियमित शासन-उपकरण नहीं। इस निर्णय के पश्चात अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग उल्लेखनीय रूप से घटा है।

निष्कर्ष

44वें संशोधन (1978) ने 1975 के आपात के अनुभव से सीख लेते हुए सुरक्षा-कवच जोड़े — लिखित मंत्रिमंडलीय सिफारिश, विशेष बहुमत, अनुच्छेद 20-21 का अनिलंबन। आपात उपबंध राष्ट्र की एकता-अखंडता के रक्षक हैं, परंतु लोकतंत्र के लिए दुधारी तलवार भी — न्यायिक पुनर्विलोकन व संसदीय नियंत्रण ही दुरुपयोग के विरुद्ध वास्तविक प्रहरी हैं।


7. अध्याय 6 — संविधान संशोधन (Art. 368) एवं मूल ढाँचा सिद्धांत

7.1 संशोधन की तीन प्रक्रियाएँ

प्रक्रिया बहुमत उदाहरण
साधारण बहुमत (Art. 368 से बाहर) सामान्य विधायी बहुमत नए राज्य, नागरिकता, अनुसूचियाँ V-VI
विशेष बहुमत प्रत्येक सदन की कुल संख्या का बहुमत + उपस्थित-मतदान का 2/3 मूल अधिकार, DPSP
विशेष बहुमत + राज्यों का अनुसमर्थन उपरोक्त + आधे राज्य विधानमंडलों की स्वीकृति राष्ट्रपति निर्वाचन, संघ-राज्य संबंध, न्यायपालिका, Art. 368 स्वयं

7.2 मूल अधिकारों में संशोधन — न्यायिक यात्रा

शंकरी प्रसाद (1951) — अनुच्छेद 368 से मूल अधिकार संशोधित किए जा सकते हैं; गोलकनाथ (1967) — मूल अधिकार संशोधित नहीं किए जा सकते; 24वाँ संशोधन (1971) — अनुच्छेद 368 की शक्ति पुनः स्पष्ट की गई; केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य (1973, 13-न्यायाधीश पीठ) — संशोधन हो सकता है, परंतु संविधान का मूल ढाँचा (basic structure) अनुल्लंघनीय है; 42वाँ संशोधन (1976) ने अनुच्छेद 368 की शक्ति को असीमित बताने का प्रयास किया; मिनर्वा मिल्स बनाम भारत संघ (1980) — अनुच्छेद 368(4)-(5) असंवैधानिक घोषित; सीमित संशोधन-शक्ति स्वयं मूल ढाँचे का भाग है; I.R. Coelho बनाम तमिलनाडु राज्य (2007) — 24-4-1973 के पश्चात नवीं अनुसूची में डाली गई विधियाँ भी मूल ढाँचा-परीक्षण के अधीन होंगी।

7.3 मूल ढाँचे के घोषित तत्व

संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, शक्ति-पृथक्करण, न्यायिक पुनर्विलोकन (L. Chandra Kumar v. UOI, 1997 — अधिकरण उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय की अनुच्छेद 226/32 की शक्ति को बाहर नहीं कर सकते), संघवाद, धर्मनिरपेक्षता व लोकतंत्र (S.R. Bommai), स्वतंत्र-निष्पक्ष चुनाव, अनुच्छेद 14-19-21 का स्वर्ण त्रिकोण।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 368 "संविधायी शक्ति" है, परंतु व्युत्पन्न (derivative) — यह संविधान की मौलिक पहचान नहीं बदल सकती। संशोधन-शक्ति और न्यायिक पुनर्विलोकन के बीच यह संतुलन ही भारतीय संविधानवाद की आत्मा है।


8. निष्कर्ष

केंद्र-राज्य विधायी संबंध, व्यापार की स्वतंत्रता, सेवा-संरक्षण, आपातकालीन उपबंध और संशोधन-शक्ति — ये सभी विषय भारतीय संविधान के संघीय संतुलन के विभिन्न आयाम प्रस्तुत करते हैं। एस.आर. बोम्मई, Atiabari, पी.एल. धींगरा एवं केशवानंद भारती जैसे वादों ने इस संतुलन को सुदृढ़ करने में न्यायपालिका की निर्णायक भूमिका को स्थापित किया है — जहाँ संविधान की शाब्दिक शक्तियाँ लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए न्यायिक व्याख्या से सीमाबद्ध हुई हैं।


9. परीक्षा-दृष्टि तालिका (Exam Relevance Table)

अध्याय संभावित अंक विगत वर्षों में आया 2026 संभावना
विधायी संबंध (245-255) 16 प्रशासनिक संबंध 2025 में अत्यधिक (rotation से due)
व्यापार की स्वतंत्रता (301-307) + Atiabari 16 बार-बार उच्च
सेवाएँ (308-323) + Dhingra 16 2025 मध्यम-उच्च
निर्वाचन आयोग + Seshan 16 2025 मध्यम
आपातकालीन प्रावधान (352/356/360) 16 2025 में नहीं आया अत्यधिक (सबसे बड़ा दावेदार)
संशोधन + मूल ढाँचा (368) 16 2025 उच्च
खण्ड-ब केस (S.R. Bommai) 16 अभी तक नहीं पूछा गया लगभग निश्चित

10. संदर्भ ग्रंथ सूची (Bibliography)

  1. भारत का संविधान — बेयर एक्ट (अनुच्छेद 245-395)
  2. एम.पी. जैन, Indian Constitutional Law, LexisNexis
  3. डी.डी. बसु, Introduction to the Constitution of India
  4. संबंधित वाद: S.R. Bommai v. Union of India, AIR 1994 SC 1918; Atiabari Tea Co. v. State of Assam, 1961 AIR 232; P.L. Dhingra v. Union of India, AIR 1958 SC 36; T.N. Seshan v. Union of India, (1995) 4 SCC 611; Kesavananda Bharati v. State of Kerala, (1973) 4 SCC 225; Minerva Mills v. Union of India, AIR 1980 SC 1789; I.R. Coelho v. State of T.N., (2007) 2 SCC 1