अपकृत्य विधि में कठोर एवं आत्यंतिक दायित्व : राइलैंड्स बनाम फ्लेचर से एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ तक — भारतीय अपकृत्य विधि में दोष-रहित दायित्व का समालोचनात्मक अध्ययन
विषय-सूची
- प्रस्तावना
- अपकृत्य विधि में दोष की सामान्य अपेक्षा
- वाद-अध्ययन: राइलैंड्स बनाम फ्लेचर (1868) — कठोर दायित्व की उत्पत्ति
- राइलैंड्स बनाम फ्लेचर के नियम के आवश्यक तत्व
- राइलैंड्स बनाम फ्लेचर के नियम के अपवाद
- भारतीय विचलन: एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ (1987) का वाद-अध्ययन
- तुलनात्मक विश्लेषण — कठोर दायित्व एवं आत्यंतिक दायित्व
- आत्यंतिक दायित्व का औचित्य — औद्योगिक समाज हेतु स्वदेशी न्यायशास्त्र
- पश्चातवर्ती विकास — भोपाल मुकदमेबाज़ी एवं वैधानिक संहिताकरण
- समालोचनात्मक मूल्यांकन
- निष्कर्ष वाद-सूची अधिनियम-सूची संदर्भ ग्रंथ-सूची
संक्षिप्ताक्षर सूची
| संक्षिप्ताक्षर | पूर्ण रूप |
|---|---|
| AIR | ऑल इंडिया रिपोर्टर |
| HL | House of Lords |
| NGT | राष्ट्रीय हरित अधिकरण |
| SC | सर्वोच्च न्यायालय |
| SCC | Supreme Court Cases |
वाद-सूची
- राइलैंड्स बनाम फ्लेचर, (1868) LR 3 HL 330
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ, AIR 1987 SC 1086
- Nichols v. Marsland, (1876) 2 Ex D 1
- Box v. Jubb, (1879) 4 Ex D 76
- यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन बनाम भारत संघ, (1991) 4 SCC 584
- इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ, (1996) 3 SCC 212
I. प्रस्तावना
1.1 पृष्ठभूमि
अपकृत्यीय दायित्व का सामान्य सिद्धांत, जैसा विनफील्ड व सामण्ड के लेखन में परंपरागत रूप से व्यक्त किया गया है, सिविल दायित्व के आधार के रूप में दोष (fault) — चाहे आशय के रूप में हो या उपेक्षा के रूप में — के अस्तित्व को पूर्वधारित करता है। फिर भी सामान्य विधि ने, उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से, मामलों की एक विशिष्ट श्रेणी को मान्यता दी है जिसमें दायित्व प्रतिवादी की ओर से किसी दोष के प्रमाण से स्वतंत्र रूप से अधिरोपित किया जाता है, केवल इस कारण से कि प्रतिवादी ने किसी ऐसी गतिविधि में संलग्न होकर, या अपनी भूमि पर ऐसी वस्तु लाकर, जो अंतर्निहित रूप से दूसरों को हानि कारित करने के जोखिम से युक्त हो, कार्य किया है। यह शोध-प्रपत्र इस "दोष-रहित" दायित्व के सिद्धांत का विस्तृत अध्ययन करता है, अंग्रेजी निर्णय राइलैंड्स बनाम फ्लेचर¹ में इसकी उत्पत्ति का, तथा भारतीय भूमि पर, सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ² में व्यक्त "आत्यंतिक दायित्व" के कहीं अधिक कठोर सिद्धांत में इसके रूपांतरण का, अनुरेखण करते हुए।
1.2 समस्या का कथन
जहाँ राइलैंड्स बनाम फ्लेचर ने यह स्थापित किया कि जो व्यक्ति अपनी भूमि पर कोई ऐसी वस्तु लाता है, तथा वहाँ रखता है, जो निकल भागने पर हानि करने में समर्थ है, वह प्रथम-दृष्ट्या उस समस्त हानि के लिए उत्तरदायी है जो उसके निकल भागने का स्वाभाविक परिणाम है, वहीं यह नियम, अपनी उत्पत्ति से ही, अपवादों की एक शृंखला — दैवीय कृत्य, अजनबी का कृत्य, वादी की स्वयं की चूक, सम्मति, तथा सांविधिक प्राधिकार — से योग्य किया गया था, जिसने इसकी व्यावहारिक पहुँच को काफी संकीर्ण कर दिया। एम.सी. मेहता में, जो भोपाल गैस त्रासदी के विशिष्ट पश्चात संदर्भ में निर्णीत हुआ, भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने यह अभिनिर्धारित किया कि ये परंपरागत सामान्य विधि अपवाद भारत में संचालित परिसंकटमय उद्योगों पर कोई प्रयोज्यता नहीं रखते, तथा "आत्यंतिक दायित्व" का एक सर्वथा अधिक कठोर मानक गढ़ा, जो किसी अपवाद से अबाधित है। यह शोध-प्रपत्र दोनों निर्णयों का तुलनात्मक सैद्धांतिक अध्ययन करता है, भारतीय विचलन को उसके ऐतिहासिक व न्यायशास्त्रीय संदर्भ में स्थापित करते हुए।
1.3 उद्देश्य एवं क्षेत्र
यह शोध-प्रपत्र निम्नलिखित का प्रयास करता है: (क) अपकृत्य विधि के सामान्य दोष-आधारित आधार की जाँच, जिसके विरुद्ध कठोर दायित्व एक अपवाद के रूप में संचालित होता है; (ख) राइलैंड्स बनाम फ्लेचर का विस्तृत वाद-अध्ययन तथा उसमें स्थापित नियम के आवश्यक तत्वों व अपवादों को व्यक्त करना; (ग) एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ का समान रूप से विस्तृत वाद-अध्ययन; (घ) दोनों सिद्धांतों की व्यवस्थित तुलना; तथा (ङ) आत्यंतिक दायित्व के सिद्धांत का, एक तीव्रता से औद्योगीकृत हो रहे समाज की परिस्थितियों के अनुरूप स्वदेशी भारतीय न्यायशास्त्रीय नवाचार के उदाहरण के रूप में, समालोचनात्मक मूल्यांकन।
1.4 शोध पद्धति
यह एक सैद्धांतिक अध्ययन है जो अंग्रेजी व भारतीय न्यायालयों के निर्णीत वादों, तथा अपकृत्य विधि पर मानक टीकाओं पर आधारित है।
II. अपकृत्य विधि में दोष की सामान्य अपेक्षा
विनफील्ड अपकृत्यीय दायित्व को उस कर्तव्य के भंग से उत्पन्न होने वाला परिभाषित करते हैं जो मुख्यतः विधि द्वारा निर्धारित है, समस्त व्यक्तियों के प्रति देय है, तथा जिसका उपचार अपरिनिर्धारित नुकसानी हेतु वाद है। इस सामान्य संकल्पना का केंद्र दोष की अपेक्षा है — प्रतिवादी को सामान्यतः यह दर्शाया जाना चाहिए कि उसने या तो हानि कारित करने के आशय से कार्य किया, या युक्तियुक्त सावधानी की कमी से जो उपेक्षा के समान हो। सूक्ति actus non facit reum nisi mens sit rea, यद्यपि सामान्यतः आपराधिक विधि से संबद्ध है, अपकृत्य विधि की दायित्व हेतु किसी दोषी मानसिक स्थिति या आचरण पर सामान्य बल में एक समरूप प्रतिध्वनि पाती है। इसी दोष-केंद्रित पृष्ठभूमि के विरुद्ध कठोर (तथा, अधिक प्रबल रूप से, आत्यंतिक) दायित्व के सिद्धांत को एक जानबूझकर व महत्वपूर्ण विचलन के रूप में समझा जाना चाहिए — एक ऐसा विचलन जो प्रतिवादी की दोषिता के संदर्भ से नहीं, अपितु जोखिम-वितरण, हानि-वितरण, तथा इस आर्थिक सिद्धांत के व्यापक विचारों से न्यायोचित है कि जो व्यक्ति अपने ही लाभ हेतु समुदाय में एक असाधारण जोखिम प्रस्तुत करता है, उसे उस जोखिम से परिणामित किसी भी हानि की लागत वहन करनी चाहिए, चाहे उसे रोकने हेतु कितनी भी सावधानी क्यों न बरती गई हो।
III. वाद-अध्ययन: राइलैंड्स बनाम फ्लेचर, (1868) LR 3 HL 330 — कठोर दायित्व की उत्पत्ति
3.1 तथ्य
प्रतिवादी ने अपनी मिल को पानी की आपूर्ति के प्रयोजन हेतु अपनी भूमि पर एक जलाशय के निर्माण के लिए स्वतंत्र ठेकेदारों को नियुक्त किया। खुदाई के दौरान, ठेकेदारों को कई परित्यक्त खान-सुरंगें व मार्ग मिले, जो प्रतिवादी की भूमि को वादी की सटी हुई कोयला-खान से जोड़ते थे, जिन्हें ठेकेदारों ने, उपेक्षा के कारण, ठीक से बंद नहीं किया। जब जलाशय भर गया, तो पानी पुरानी सुरंगों के माध्यम से फूट पड़ा तथा वादी की खान में भर गया, जिससे व्यापक हानि हुई। महत्वपूर्ण रूप से, प्रतिवादी स्वयं व्यक्तिगत रूप से उपेक्षापूर्ण नहीं था — उपेक्षा, जो भी थी, स्वतंत्र ठेकेदारों की थी, तथा वे भी सुरंगों के अस्तित्व को अपनी किसी चूक से नहीं खोज पाए थे, अपितु जोखिम स्पष्ट होने के पश्चात उचित सावधानी बरतने में विफल रहे।
3.2 विवाद्यक
केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या, प्रतिवादी को व्यक्तिगत रूप से आरोपित किसी उपेक्षा के अभाव में, उसे फिर भी उस हानि के लिए उत्तरदायी ठहराया जा सकता है जो उसने अपने ही प्रयोजनों हेतु अपनी भूमि पर एकत्र किए गए पानी के निकल भागने से कारित हुई।
3.3 निर्णय
प्रथम दृष्टया तथा पुनः Exchequer Chamber में, न्यायमूर्ति ब्लैकबर्न ने वह सूत्रीकरण प्रस्तुत किया जो नियम का शास्त्रीय कथन बन गया:
"हम मानते हैं कि विधि का सच्चा नियम यह है कि जो व्यक्ति अपने ही प्रयोजनों हेतु अपनी भूमि पर ऐसी कोई वस्तु लाता है तथा उसे एकत्र कर वहाँ रखता है जो निकल भागने पर हानि करने में समर्थ है, उसे अपने संकट पर वहाँ रोके रखना चाहिए, तथा यदि वह ऐसा नहीं करता, तो वह प्रथम-दृष्ट्या उस समस्त हानि के लिए उत्तरदायी है जो उसके निकल भागने का स्वाभाविक परिणाम है।"
हाउस ऑफ लॉर्ड्स ने, लॉर्ड कैयर्न्स के माध्यम से, इस सूत्रीकरण की पुष्टि की, यह अतिरिक्त अर्हता जोड़ते हुए — जो पश्चातवर्ती रूप से पर्याप्त महत्व की सिद्ध हुई — कि यह नियम केवल तभी लागू होता है जब प्रतिवादी द्वारा अपनी भूमि का उपयोग एक "अप्राकृतिक" उपयोग हो, जिससे नियम के प्रवर्तन हेतु एक महत्वपूर्ण, तथा प्रायः विवादास्पद, सीमा-अपेक्षा प्रस्तुत हुई।
3.4 अभिनिर्धारित सिद्धांत
राइलैंड्स बनाम फ्लेचर इस प्रकार दोष के प्रमाण के बिना दायित्व स्थापित करता है, तीन आवश्यक तत्वों के अधीन, जिनकी चर्चा आगामी भाग में की गई है।
IV. राइलैंड्स बनाम फ्लेचर के नियम के आवश्यक तत्व
यह नियम, जैसा पश्चातवर्ती न्यायिक विस्तार के माध्यम से समझा गया है, तीन तत्वों की संचयी संतुष्टि की अपेक्षा करता है:
- खतरनाक वस्तु: प्रतिवादी को अपनी भूमि पर कोई ऐसी वस्तु लानी या एकत्र करनी चाहिए जो निकल भागने पर हानि करने में समर्थ हो — "खतरनाक वस्तुओं" की श्रेणी को, समय के साथ, सादृश्य द्वारा पानी (जैसा स्वयं राइलैंड्स में) से गैस, बिजली, विस्फोटक, हानिकारक धुएँ, तथा कुछ न्यायक्षेत्रों में जंग लगे तार के संचय व औद्योगिक मशीनरी से कंपन तक विस्तारित किया गया है।
- निकल भागना (Escape): प्रश्नगत वस्तु को उस स्थान से निकल भागना चाहिए जहाँ प्रतिवादी का उस पर नियंत्रण है, ऐसे स्थान तक जो उसके अधिभोग या नियंत्रण से बाहर हो — एक अपेक्षा जो, जैसा आगे भाग VI में देखा जाएगा, भारतीय आत्यंतिक दायित्व सिद्धांत को उसके अंग्रेजी पूर्वज से पृथक करने में निर्णायक सिद्ध होनी थी।
- भूमि का अप्राकृतिक उपयोग: प्रतिवादी द्वारा, खतरनाक वस्तु का संचय करने में, अपनी भूमि का उपयोग एक "अप्राकृतिक" उपयोग गठित करना चाहिए — एक कुछ लचीली व विवादास्पद कसौटी, जो सामान्यतः भूमि के सामान्य व लाभकारी उपयोगों (जैसे पानी या गैस का घरेलू उपयोग) को अपवर्जित करने तथा उन उपयोगों तक सीमित होने के रूप में समझी जाती है जो संबंधित विशिष्ट समय व स्थान को ध्यान में रखते हुए पड़ोस में एक बढ़ा हुआ या असाधारण जोखिम प्रस्तुत करते हैं।
जहाँ ये तीन तत्व स्थापित होते हैं, वहाँ प्रतिवादी को, अपनी ओर से उपेक्षा की पूर्ण अनुपस्थिति के बावजूद, उत्तरदायी ठहराया जाता है — एक परिणाम जो, जैसा न्यायमूर्ति ब्लैकबर्न का सूत्रीकरण स्पष्ट करता है, इस आधार पर न्यायोचित है कि जो व्यक्ति अपने ही लाभ हेतु ऐसा जोखिम प्रस्तुत करता है, वह "इसे अपने संकट पर रखता है।"
V. राइलैंड्स बनाम फ्लेचर के नियम के अपवाद
यह नियम, कठोर दायित्व के एक नियम के रूप में अपने सूत्रीकरण के बावजूद, प्रारंभ से ही कई सुस्थापित अपवादों के अधीन था, जो इसकी व्यावहारिक कठोरता को काफी योग्य करते हैं:
- दैवीय कृत्य (vis major): जहाँ निकल भागना ऐसी असाधारण प्रकृति की प्राकृतिक शक्तियों से कारित होता है कि किसी मानवीय पूर्वानुमान से उन्हें प्रत्याशित या उनसे रक्षा नहीं की जा सकती थी, वहाँ प्रतिवादी क्षमा योग्य है — जैसा Nichols v. Marsland³ में दृष्टांतित है, जहाँ प्रतिवादी के जलाशयों में किसी अंतर्निहित दोष के बजाय एक अभूतपूर्व व अप्रत्याशित वर्षा-तूफान ने पानी के निकल भागने को कारित किया।
- अजनबी का कृत्य: जहाँ निकल भागना किसी तृतीय पक्ष के जानबूझकर किए गए, अप्राधिकृत कृत्य से कारित होता है, जिस पर प्रतिवादी का कोई नियंत्रण नहीं है, तथा जिसे प्रतिवादी युक्तियुक्त रूप से प्रत्याशित या उससे रक्षा नहीं कर सकता था — जैसा Box v. Jubb⁴ में, जहाँ किसी तृतीय पक्ष द्वारा अपने ही जलाशय को प्रतिवादी के जलाशय में खाली करने के कृत्य ने शिकायत किए गए अतिप्रवाह को कारित किया।
- वादी की स्वयं की चूक: जहाँ निकल भागना व परिणामी हानि वादी की स्वयं की चूक या दोष के लिए जिम्मेदार हो, वहाँ प्रतिवादी उत्तरदायी नहीं है।
- वादी की सम्मति (volenti non fit injuria): जहाँ वादी ने खतरनाक वस्तु के संचय हेतु व्यक्त या विवक्षित रूप से सम्मति दी हो (सामान्यतः तब उत्पन्न होता है जब जोखिम का स्रोत वादी व प्रतिवादी दोनों के सामान्य लाभ हेतु बनाए रखा जाता है), वहाँ नियम लागू नहीं होता।
- सांविधिक प्राधिकार: जहाँ प्रतिवादी द्वारा खतरनाक वस्तु का संचय अधिनियम द्वारा, व्यक्त रूप से या आवश्यक विवक्षा द्वारा, प्राधिकृत हो, वहाँ नियम के अंतर्गत दायित्व अपवर्जित है, यद्यपि उपेक्षा में दायित्व फिर भी उत्पन्न हो सकता है यदि सांविधिक प्राधिकार का प्रयोग उचित सावधानी के बिना किया गया हो।
VI. भारतीय विचलन: एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ, AIR 1987 SC 1086 का वाद-अध्ययन
6.1 तथ्य
दिसंबर 1985 में, पूर्ववर्ती वर्ष की विनाशकारी भोपाल गैस त्रासदी के तत्काल पश्चात, दिल्ली के एक घनी आबादी वाले क्षेत्र में स्थित श्रीराम फूड्स एण्ड फर्टिलाइज़र्स इंडस्ट्रीज़ की एक फैक्टरी से ओलियम गैस का रिसाव हुआ, जिससे कई व्यक्तियों को — जिसमें तीस हज़ारी न्यायालयों में प्रैक्टिस करने वाला एक अधिवक्ता भी सम्मिलित था — क्षति पहुँची, तथा एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। एक रिट याचिका, जो प्रारंभ में उद्योग द्वारा कारित पर्यावरण प्रदूषण से संबंधित थी, को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा विस्तृत किया गया ताकि परिसंकटमय या अंतर्निहित रूप से खतरनाक उद्योगों में संलग्न उद्यमों पर प्रयोज्य दायित्व की माप के व्यापक प्रश्न पर विचार किया जा सके।
6.2 विवाद्यक
न्यायालय के समक्ष केंद्रीय प्रश्न यह था कि क्या राइलैंड्स बनाम फ्लेचर का परंपरागत अंग्रेजी नियम — अपने साथ आने वाले अपवादों तथा प्रतिवादी के परिसर से "निकल भागने" की अपेक्षा सहित — भारत जैसे तीव्रता से औद्योगीकृत हो रहे, घनी आबादी वाले देश में संचालित परिसंकटमय उद्योगों हेतु दायित्व की एक पर्याप्त व उपयुक्त माप था, अथवा एक सर्वथा अधिक कठोर, स्वदेशी रूप से विकसित मानक की आवश्यकता थी।
6.3 निर्णय (मुख्य न्यायाधीश भगवती द्वारा)
मुख्य न्यायाधीश भगवती ने, न्यायालय का निर्णय सुनाते हुए, यह अभिनिर्धारित किया कि राइलैंड्स बनाम फ्लेचर का नियम, जो उन्नीसवीं शताब्दी के इंग्लैंड में एक कम औद्योगिक रूप से विकसित व कम घनी आबादी वाले समाज के संदर्भ में विकसित हुआ था, भारत जैसी आधुनिक औद्योगिक अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपर्याप्त था, विशेषतः घनी आबादी वाले शहरी केंद्रों में या उनके निकट स्थित परिसंकटमय उद्योगों से कारित हो सकने वाली हानि की मात्रा को देखते हुए। न्यायालय ने तदनुसार "आत्यंतिक दायित्व" का एक नया, तथा काफी अधिक कठोर, नियम प्रतिपादित किया, जिसे इस प्रकार व्यक्त किया गया:
"जहाँ कोई उद्यम किसी परिसंकटमय या अंतर्निहित रूप से खतरनाक गतिविधि में संलग्न है तथा ऐसी परिसंकटमय या अंतर्निहित रूप से खतरनाक गतिविधि के संचालन में किसी दुर्घटना के कारण, उदाहरणार्थ, विषैली गैस के निकल भागने में परिणामित होते हुए, किसी को हानि होती है, वहाँ उद्यम उस दुर्घटना से प्रभावित समस्त व्यक्तियों को क्षतिपूर्ति करने हेतु कठोरता से एवं आत्यंतिक रूप से उत्तरदायी है, तथा ऐसा दायित्व उन अपवादों में से किसी के अधीन नहीं है जो राइलैंड्स बनाम फ्लेचर के नियम के अंतर्गत कठोर दायित्व के अपकृत्यीय सिद्धांत के संबंध में प्रवर्तित होते हैं।"
6.4 अभिनिर्धारित सिद्धांत
एम.सी. मेहता में निर्धारित आत्यंतिक दायित्व के सिद्धांत के आवश्यक तत्वों को इस प्रकार संक्षेपित किया जा सकता है:
- कोई अपवाद नहीं: यह सिद्धांत किसी भी अपवाद को स्वीकार नहीं करता — न दैवीय कृत्य, न अजनबी का कृत्य, न वादी की स्वयं की चूक, न सांविधिक प्राधिकार। इसका औचित्य यह है कि परिसंकटमय गतिविधि में संलग्न उद्यम समुदाय के प्रति यह सुनिश्चित करने का एक आत्यंतिक व अप्रत्यायोज्य कर्तव्य रखता है कि उस गतिविधि से कोई हानि न हो, तथा वह परंपरागत सामान्य विधि बचावों में से किसी की ओर इशारा करके दायित्व से बच नहीं सकता।
- निकल भागना आवश्यक नहीं: राइलैंड्स बनाम फ्लेचर के नियम के विपरीत, जो खतरनाक पदार्थ को प्रतिवादी के परिसर की सीमा से बाहर निकल भागने की अपेक्षा करता है, आत्यंतिक दायित्व का सिद्धांत उद्यम के अपने ही परिसर के भीतर पीड़ित व्यक्तियों — उदाहरणार्थ, स्वयं परिसंकटमय उद्योग में नियोजित कामगारों — तक विस्तारित होता है, जिससे क्षतिपूर्ति के हकदार व्यक्तियों का वर्ग काफी विस्तृत हो जाता है।
- उद्यम की क्षमता से सह-संबंधित क्षतिपूर्ति की माप: देय क्षतिपूर्ति की मात्रा को उद्यम के परिमाण व क्षमता से सह-संबंधित किया जाना है, ताकि दायित्व का उद्यम की भुगतान-क्षमता के अनुपात में निवारक प्रभाव हो, तथा ताकि परिसंकटमय गतिविधियों में संलग्न बड़े, अधिक लाभकारी उद्यम तदनुरूप बड़ी उत्तरदायित्व की मात्रा वहन करें।
- संवैधानिक मूल्यों में निहित औचित्य: न्यायालय ने इस सिद्धांत को केवल अपकृत्य-विधि नीति विचारों में ही नहीं, अपितु अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार की संवैधानिक गारंटी में भी आधारित किया, यह तर्क देते हुए कि जो उद्यम समुदाय के स्वास्थ्य व सुरक्षा के लिए संभावित खतरा प्रस्तुत करने वाली गतिविधि में संलग्न है, वह उस संवैधानिक गारंटी के अनुरूप एक कर्तव्य रखता है।
6.5 समालोचनात्मक विश्लेषण
एम.सी. मेहता स्वदेशी भारतीय न्यायिक विधि-निर्माण के सर्वाधिक प्रसिद्ध उदाहरणों में से एक प्रस्तुत करता है, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने, किसी अंग्रेजी सामान्य विधि नियम को यांत्रिक रूप से आयातित करने के बजाय, सचेत व स्पष्ट रूप से राइलैंड्स बनाम फ्लेचर का पालन करने से इस आधार पर इनकार किया कि भारतीय परिस्थितियाँ — परिसंकटमय औद्योगिक गतिविधि का पैमाना, ऐसे उद्योगों के निकट सन्निकटता में रहने वाली शहरी आबादी का घनत्व, तथा औद्योगिक दुर्घटनाओं से प्रभावित होने की संभावना वाले व्यक्तियों की सामाजिक-आर्थिक सुभेद्यता — एक अधिक दावेदार-संरक्षक मानक की अपेक्षा करती हैं। इस निर्णय का महत्व केवल तथ्यों पर उसके परिणाम में ही नहीं (क्षतिपूर्ति वास्तव में पश्चातवर्ती कार्यवाहियों में मूल्यांकित की गई) अपितु इसके द्वारा भारतीय अपकृत्य विधि के एक सामान्यतः प्रयोज्य सिद्धांत की स्थापना में भी निहित है, जो पश्चातवर्ती रूप से परिसंकटमय उद्योगों से जुड़े अनेक मामलों में — सर्वाधिक उल्लेखनीय रूप से स्वयं दीर्घ भोपाल गैस मुकदमेबाज़ी में — लागू व परिष्कृत किया गया।
VII. तुलनात्मक विश्लेषण — कठोर दायित्व एवं आत्यंतिक दायित्व
| आधार | कठोर दायित्व (राइलैंड्स, 1868) | आत्यंतिक दायित्व (एम.सी. मेहता, 1987) |
|---|---|---|
| अपवाद | पाँच मान्यता-प्राप्त अपवाद उपलब्ध | कोई अपवाद नहीं |
| निकल भागना | आवश्यक तत्व | आवश्यक नहीं — उद्यम परिसर के भीतर हानि तक विस्तारित |
| गतिविधि की प्रकृति | भूमि का अप्राकृतिक उपयोग | परिसंकटमय या अंतर्निहित रूप से खतरनाक उद्योग |
| क्षतिपूर्ति की मात्रा | सामान्यतः कारित हानि के अनुपात में | निवारण सुनिश्चित करने हेतु उद्यम की क्षमता से सह-संबंधित |
| अंतर्निहित औचित्य | पड़ोसी भूमि-स्वामियों के बीच जोखिम-वितरण | जीवन का संवैधानिक अधिकार (अनु. 21); औद्योगिक परिसंकट से समुदाय की सुरक्षा |
दोनों सिद्धांत, यद्यपि दोष-सिद्धांत से अपने साझा विचलन के कारण प्रायः साथ चर्चित होते हैं, अतः विश्लेषणात्मक रूप से पृथक हैं: राइलैंड्स बनाम फ्लेचर कठोर दायित्व का एक नियम बना रहता है, जो परिभाषित अपवादों को स्वीकार करता है तथा प्रतिवादी की भूमि से "निकल भागने" के मामलों तक सीमित है; एम.सी. मेहता आत्यंतिक दायित्व का एक नियम स्थापित करता है, जो किसी अपवाद को स्वीकार नहीं करता तथा उद्यम के अपने ही परिसर के भीतर पीड़ित हानि तक विस्तारित होता है। तदनुसार, यह विश्लेषणात्मक रूप से अशुद्ध है — यद्यपि विद्यार्थियों के उत्तरों में एक सामान्य त्रुटि है — कि एम.सी. मेहता को केवल भारतीय तथ्यों पर राइलैंड्स बनाम फ्लेचर के नियम को "लागू" करने वाला मान लिया जाए; भारतीय सर्वोच्च न्यायालय ने वस्तुतः उस नियम को लागू करने से इनकार किया, तथा इसके बजाय एक पृथक व अधिक कठोर सिद्धांत गढ़ा।
VIII. आत्यंतिक दायित्व का औचित्य — औद्योगिक समाज हेतु स्वदेशी न्यायशास्त्र
एम.सी. मेहता में सैद्धांतिक नवाचार को दिसंबर 1984 की भोपाल गैस त्रासदी की विशिष्ट ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के विरुद्ध समझा जाना चाहिए, जिसमें यूनियन कार्बाइड के एक कीटनाशक संयंत्र से मिथाइल आइसोसाइनेट गैस के रिसाव से कई हज़ार मृत्यु व लाखों व्यक्तियों को क्षति हुई — एक ऐसी विभीषिका जिसने, सर्वाधिक स्पष्ट संभव शब्दों में, बड़े पैमाने की औद्योगिक विपत्ति के पीड़ितों को सार्थक उपचार प्रदान करने में कठोर दायित्व (उपलब्ध बचावों सहित) के परंपरागत सामान्य विधि ढाँचे की अपर्याप्तता को उजागर किया। अगले वर्ष निर्णीत मुख्य न्यायाधीश भगवती का एम.सी. मेहता में निर्णय, इस प्रकार, इस राष्ट्रीय त्रासदी के प्रति एक प्रत्यक्ष न्यायिक प्रत्युत्तर के रूप में पढ़ा जा सकता है — यह सुनिश्चित करने का एक प्रयास कि भारतीय अपकृत्य विधि अब एक कृषि-प्रधान समाज हेतु विकसित उन्नीसवीं शताब्दी के अंग्रेजी नियम की बंधक नहीं रहेगी, अपितु इसके बजाय एक ऐसे न्यायशास्त्र को प्रतिबिंबित करेगी जो एक तीव्रता से औद्योगीकृत हो रहे राष्ट्र की वास्तविकताओं के अनुरूप हो, जिसमें परिसंकटमय उद्योग प्रायः घनी मानव-बस्तियों के निकट संचालित होते हैं।
IX. पश्चातवर्ती विकास — भोपाल मुकदमेबाज़ी एवं वैधानिक संहिताकरण
आत्यंतिक दायित्व के सिद्धांत को पश्चातवर्ती रूप से महत्वपूर्ण मामलों की एक शृंखला में आह्वान किया गया, तथा उसका औचित्य विस्तारित किया गया, सर्वाधिक उल्लेखनीय रूप से इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ⁵ में (रासायनिक उद्योग प्रदूषण के संदर्भ में आत्यंतिक दायित्व के साथ "प्रदूषक भुगतान करे" सिद्धांत को लागू करते हुए), जबकि स्वयं भोपाल विपत्ति ने दीर्घ मुकदमेबाज़ी को जन्म दिया, जिसमें यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन बनाम भारत संघ⁶ सम्मिलित है, जो भोपाल गैस रिसाव विपत्ति (दावों का संसाधन) अधिनियम, 1985 के अंतर्गत पीड़ितों के दावों के निपटान से संबंधित है। विधायी स्तर पर, आत्यंतिक दायित्व के सिद्धांत को तब से लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991 (परिसंकटमय पदार्थों को संभालने वाले उद्यमों हेतु बीमा कवर अनिवार्य करते हुए, ताकि दुर्घटना-पीड़ितों को तत्काल राहत सुनिश्चित हो) तथा राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 की धारा 17 (जो परिसंकटमय पदार्थों को संभालते समय होने वाली दुर्घटनाओं के मामलों में राहत व क्षतिपूर्ति हेतु "दोष-रहित दायित्व" के सिद्धांत को समाहित करती है) में वैधानिक सुदृढ़ीकरण प्राप्त हुआ है।
X. समालोचनात्मक मूल्यांकन
आत्यंतिक दायित्व का सिद्धांत परिसंकटमय गतिविधि में संलग्न उद्यमों के विरुद्ध औद्योगिक विपत्ति के पीड़ितों की स्थिति का एक महत्वपूर्ण सुदृढ़ीकरण प्रस्तुत करता है, तथा समस्त परंपरागत बचावों का इसका उन्मूलन यह सुनिश्चित करता है कि निर्दोष पीड़ित के बजाय उद्यम — जो उस गतिविधि से आर्थिक लाभ अर्जित करता है — हानि की लागत वहन करे। साथ ही, इस सिद्धांत ने कुछ आलोचनाएँ आकर्षित की हैं: प्रथम, किसी वास्तविक, अप्रत्याशित तृतीय पक्ष के दुर्भावनापूर्ण कृत्य (जैसे तोड़-फोड़) की परिस्थितियों में भी किसी बचाव की अनुपस्थिति को कुछ टीकाकारों द्वारा उद्यम की वास्तविक नियंत्रण-क्षमता के असमान दायित्व अधिरोपित करने वाला माना जा सकता है; द्वितीय, सीमित वित्तीय क्षमता वाले उद्यमों से जुड़े मामलों में "निवारक" क्षतिपूर्ति मॉडल की व्यावहारिक पर्याप्तता के संबंध में प्रश्न बने रहते हैं, क्योंकि उद्यम की आर्थिक क्षमता से सह-संबंधित क्षतिपूर्ति व्यवस्था वहाँ पीड़ितों को तदनुरूप घटा हुआ संरक्षण प्रदान करती है जहाँ वह क्षमता स्वयं सीमित हो; तथा तृतीय, इस सिद्धांत का प्रयोग, व्यवहार में, प्रायः मात्रा पर दीर्घ मुकदमेबाज़ी तथा बहुराष्ट्रीय या अन्यथा दुष्प्राप्य कॉर्पोरेट प्रतिवादियों के विरुद्ध क्षतिपूर्ति-अधिनिर्णयों को प्रवर्तित करने की व्यावहारिक कठिनाई से जटिल हुआ है, जैसा दशकों-लंबी भोपाल मुकदमेबाज़ी स्वयं स्पष्ट रूप से दर्शाती है।
XI. निष्कर्ष
राइलैंड्स बनाम फ्लेचर से एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ तक की यात्रा सामान्य विधि परंपरा में दोष-रहित दायित्व के विकास में एक व्यापक प्रक्षेप-पथ का अनुरेखण करती है — उन्नीसवीं शताब्दी के एक अंग्रेजी नियम से, जो मुख्यतः पड़ोसी भूमि-स्वामियों के पारस्परिक अधिकारों से संबंधित था तथा सामान्य विधि बचावों की एक शृंखला द्वारा योग्य था, एक विशिष्ट भारतीय आत्यंतिक दायित्व सिद्धांत तक, जो एक तीव्रता से औद्योगीकृत हो रहे समाज की परिस्थितियों हेतु विशेष रूप से निर्मित है — जिसमें परिसंकटमय उद्योग प्रायः घनी मानव-बस्तियों के निकट संचालित होते हैं — तथा जो स्पष्ट रूप से जीवन के अधिकार की संवैधानिक गारंटी में आधारित है। एम.सी. मेहता इस अर्थ में, केवल एक प्रयोग के रूप में नहीं, अपितु अपने अंग्रेजी पूर्वज से एक सैद्धांतिक व सचेत रूप से स्वदेशी विचलन के रूप में खड़ा है — संपूर्ण भारतीय अपकृत्य न्यायशास्त्र निकाय में न्यायिक विधि-निर्माण के सर्वाधिक महत्वपूर्ण उदाहरणों में से एक, तथा एक ऐसा सिद्धांत जिसकी निरंतर प्रासंगिकता भारतीय अर्थव्यवस्था में औद्योगिक जोखिम की निरंतर वास्तविकता से ही सुदृढ़ होती है।
अधिनियम-सूची
- लोक दायित्व बीमा अधिनियम, 1991
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010
- भोपाल गैस रिसाव विपत्ति (दावों का संसाधन) अधिनियम, 1985
संदर्भ ग्रंथ-सूची
द्वितीयक स्रोत — पुस्तकें
- रत्नलाल एवं धीरजलाल, The Law of Torts (LexisNexis)।
- आर.के. बंगिया, Law of Torts (Allahabad Law Agency)।
- Winfield & Jolowicz, Tort (Sweet & Maxwell)।
निर्णीत वाद
- राइलैंड्स बनाम फ्लेचर, (1868) LR 3 HL 330।
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ, AIR 1987 SC 1086।
- Nichols v. Marsland, (1876) 2 Ex D 1।
- Box v. Jubb, (1879) 4 Ex D 76।
- यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन बनाम भारत संघ, (1991) 4 SCC 584।
- इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ, (1996) 3 SCC 212।
पाद-टिप्पणियाँ
- राइलैंड्स बनाम फ्लेचर, (1868) LR 3 HL 330।
- एम.सी. मेहता बनाम भारत संघ, AIR 1987 SC 1086।
- Nichols v. Marsland, (1876) 2 Ex D 1।
- Box v. Jubb, (1879) 4 Ex D 76।
- इंडियन काउंसिल फॉर एनवायरो-लीगल एक्शन बनाम भारत संघ, (1996) 3 SCC 212।
- यूनियन कार्बाइड कॉरपोरेशन बनाम भारत संघ, (1991) 4 SCC 584।