विषय-सूची (Table of Contents)

  1. प्रस्तावना (BNS↔IPC — संहिता-परिवर्तन का संक्षिप्त परिचय)
  2. अध्याय 1 — आपराधिक मानव वध एवं हत्या (BNS 100-105)
  3. अध्याय 2 — उपहति एवं घोर उपहति (BNS 114-117)
  4. अध्याय 3 — व्यपहरण एवं अपहरण (BNS 137-138)
  5. अध्याय 4 — विधि विरुद्ध जमाव (BNS 189-191)
  6. अध्याय 5 — चोरी, उद्दापन, लूट एवं डकैती (BNS 303-310)
  7. अध्याय 6 — मानहानि (BNS 356)
  8. अध्याय 7 — प्रयत्न तथा BNS के नवीन प्रावधान
  9. निष्कर्ष
  10. परीक्षा-दृष्टि तालिका
  11. संदर्भ ग्रंथ सूची

1. प्रस्तावना

भारतीय दण्ड संहिता, 1860 को प्रतिस्थापित कर भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 दिनांक 1 जुलाई 2024 से प्रभावी हुई। परीक्षा हेतु ध्यातव्य है कि 2025 से इस प्रश्न-पत्र के उत्तर पुरानी IPC धाराओं से नहीं, अपितु BNS की नई धाराओं से लिखे जाने चाहिए। नीचे त्वरित संदर्भ हेतु परिवर्तन-तालिका दी गई है:

अपराध IPC (पुरानी) BNS 2023
आपराधिक मानव वध / हत्या 299 / 300 100 / 101
उपहति / घोर उपहति 319 / 320 114 / 116
व्यपहरण / अपहरण 359-361 / 362 137 / 138
चोरी / उद्दापन / लूट / डकैती 378 / 383 / 390 / 391 303 / 308 / 309 / 310
विधि विरुद्ध जमाव 141 189
मानहानि 499-500 356
प्रयत्न 511 62

इस असाइनमेंट में शरीर के विरुद्ध अपराधों (मानव वध, हत्या, उपहति, व्यपहरण) से लेकर संपत्ति के विरुद्ध अपराधों (चोरी से डकैती तक की क्रमिक शृंखला) और अंततः प्रतिष्ठा के विरुद्ध अपराध (मानहानि) तक का क्रमबद्ध, केस-आधारित अध्ययन प्रस्तुत है।


2. अध्याय 1 — आपराधिक मानव वध एवं हत्या (BNS धारा 100, 101, 103, 105)

2.1 परिभाषाएँ

भारतीय न्याय संहिता की धारा 100 आपराधिक मानव वध तथा धारा 101 हत्या को परिभाषित करती है। सर्वमान्य सिद्धांत है — "प्रत्येक हत्या आपराधिक मानव वध है, किन्तु प्रत्येक आपराधिक मानव वध हत्या नहीं।" हत्या, आपराधिक मानव वध की ही उग्रतम प्रजाति है।

आपराधिक मानव वध (धारा 100): मृत्यु कारित करने के आशय से, या ऐसी शारीरिक क्षति के आशय से जिससे मृत्यु संभाव्य हो, या इस ज्ञान से कि कार्य से मृत्यु संभाव्य है।

हत्या (धारा 101): मृत्यु के आशय से, या ऐसी क्षति के आशय से जिससे मृत्यु होना अभिज्ञात हो, या आशयित क्षति प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु हेतु पर्याप्त हो, या कार्य इतना आसन्न-संकटमय हो कि पूर्ण संभाव्यता में मृत्यु कारित करे।

2.2 विभाजक रेखा — संभाव्यता की मात्रा

आधार आपराधिक मानव वध हत्या
मृत्यु की संभावना "संभाव्य" (likely) "पूर्ण संभाव्यता/पर्याप्त"
दण्ड धारा 105 — आजीवन या 10 वर्ष तक धारा 103 — मृत्यु या आजीवन

2.3 हत्या कब नहीं (धारा 101 के अपवाद)

गंभीर एवं अचानक प्रकोपन; निजी प्रतिरक्षा का सद्भावपूर्वक अतिक्रमण; लोक सेवक द्वारा शक्ति का सद्भावपूर्वक अतिक्रमण; अचानक झगड़ा (पूर्व-चिन्तन बिना); 18+ आयु के व्यक्ति की सहमति से मृत्यु।

🔴 लीडिंग केस : रेग बनाम गोविन्दा (Reg v. Govinda), (1877) ILR 1 Bom 342

(2023 में परीक्षा में आया; culpable homicide के हर प्रश्न में उद्धरणीय — 2026 का प्रबल दावेदार)

तथ्य: 18 वर्षीय अभियुक्त गोविन्दा ने अपनी 15 वर्षीया पत्नी को क्रोध में लात-मुक्के मारे; वह गिर पड़ी, तब उसने पत्नी के चेहरे पर घुटना रखकर प्रहार किए। मस्तिष्क में रक्तस्राव से पत्नी की मृत्यु हो गई। न घातक हथियार प्रयुक्त था, न असाधारण बल।

विवाद्यक: यह हत्या है अथवा हत्या की कोटि में न आने वाला आपराधिक मानव वध?

निर्णय: न्यायमूर्ति मेलविल ने अभिनिर्धारित किया कि यह हत्या नहीं, आपराधिक मानव वध है — आशय मृत्यु का नहीं था, न ही कारित क्षति सामान्य क्रम में मृत्यु हेतु पर्याप्त थी; मृत्यु की केवल संभावना थी, पूर्ण संभाव्यता नहीं।

प्रतिपादित सिद्धांत: "मृत्यु हेतु संभाव्य (likely to cause death)" (मानव वध) बनाम "प्रकृति के सामान्य अनुक्रम में मृत्यु हेतु पर्याप्त (sufficient in the ordinary course of nature to cause death)" (हत्या) — यही परीक्षण आज भी दोनों अपराधों के भेद का आधार है।

🔴 लीडिंग केस : के.एम. नानावटी बनाम महाराष्ट्र राज्य, AIR 1962 SC 605

तथ्य: नौसेना अधिकारी नानावटी की पत्नी सिल्विया ने प्रेम आहूजा से संबंध स्वीकार किए। नानावटी जहाज से रिवॉल्वर लेकर आहूजा के घर गए और गोली मार दी। बचाव में गंभीर एवं अचानक प्रकोपन का तर्क दिया गया।

निर्णय: यह हत्या है — पत्नी की स्वीकारोक्ति एवं आहूजा की हत्या के बीच लगभग 3 घंटे का अंतराल था; रिवॉल्वर लेना व घर जाना आत्मसंयम के लौटने तथा पूर्व-चिन्तन का प्रमाण था।

प्रतिपादित सिद्धांत: प्रकोपन का अपवाद तभी लागू होगा जब वह गंभीर एवं अचानक दोनों हो, आत्म-आमंत्रित न हो, तथा आत्मसंयम पुनः प्राप्त करने हेतु "ठंडा होने का समय" (cooling time) न मिला हो।


3. अध्याय 2 — उपहति एवं घोर उपहति (BNS धारा 114-117)

उपहति (धारा 114): जो किसी व्यक्ति को शारीरिक पीड़ा, रोग या अंग-शैथिल्य कारित करे। दण्ड — 1 वर्ष तक/₹10,000 (धारा 115)।

घोर उपहति (धारा 116) — आठ विनिर्दिष्ट (exhaustive) प्रकार: (1) पुंसत्वहरण, (2) नेत्र-दृष्टि का स्थायी नाश, (3) श्रवण-शक्ति का स्थायी नाश, (4) किसी अंग/जोड़ का नाश, (5) अंग-शक्ति का स्थायी ह्रास, (6) सिर/चेहरे का स्थायी विद्रूपण, (7) अस्थि/दाँत का भंग या विसंधान, (8) जीवन-संकटापन्न उपहति या 15 दिन तक तीव्र पीड़ा/असामर्थ्य (BNS में यह अवधि 20 दिन से घटाकर 15 दिन की गई है — यह परिवर्तन उत्तर में लिखने पर अतिरिक्त अंक मिलते हैं)

दण्ड — 7 वर्ष तक कारावास व जुर्माना (धारा 117)। यह सूची exhaustive है — इन 8 प्रकारों के बाहर कोई क्षति, चाहे कितनी भी कष्टदायक हो, घोर उपहति नहीं मानी जाएगी।


4. अध्याय 3 — व्यपहरण एवं अपहरण (BNS धारा 137-138)

व्यपहरण (धारा 137) के दो रूप हैं — भारत में से, या विधिपूर्ण संरक्षकता में से 18 वर्ष से कम आयु के बालक/बालिका या विकृतचित्त व्यक्ति को ले जाना/फुसलाना, संरक्षक की सम्मति के बिना। (BNS की एकरूपता उल्लेखनीय है — IPC में लड़का 16/लड़की 18 वर्ष थी, अब दोनों हेतु 18 वर्ष — यह परिवर्तन अवश्य लिखें)।

अपहरण (धारा 138) में किसी भी आयु के व्यक्ति को बल, प्रवंचना (deceit) या उत्प्रेरण द्वारा ले जाना सम्मिलित है।

व्यपहरण बनाम अपहरण

आधार व्यपहरण (137) अपहरण (138)
आयु 18 वर्ष से कम (या विकृतचित्त) किसी भी आयु का व्यक्ति
सम्मति अवयस्क की सम्मति अप्रासंगिक स्वतंत्र सम्मति हो तो अपराध नहीं
प्रकृति सारवान अपराध — पूर्ण होते ही दण्डनीय सहायक अपराध — दण्ड आशय पर निर्भर
निरंतरता ले जाते ही पूर्ण निरंतर अपराध (continuing offence)

प्रमुख वाद: S. Varadarajan v. State of Madras (1965) — लड़की स्वयं घर छोड़कर साथ चली गई, यह "taking" नहीं → व्यपहरण नहीं; Thakorlal D. Vadgama (1973) — पूर्व-प्रलोभन सिद्ध होने पर अपराध बनता है।


5. अध्याय 4 — विधि विरुद्ध जमाव (BNS धारा 189-191)

🔴 लीडिंग केस : मोती दास एवं अन्य बनाम बिहार राज्य, AIR 1954 SC 657

(2025 में परीक्षा में पूछा गया — रचनात्मक दायित्व के सिद्धांत हेतु महत्वपूर्ण)

तथ्य: भूमि पर कब्ज़े व फसल काटने के अधिकार का विवाद था। अपीलार्थी पक्ष लगभग 100-150 मजदूरों व 30-40 लाठैतों के साथ खेत पर पहुँचा। सोनू गोपे ने फसल ले जाने से रोका, तो मोती दास ने हमले का आदेश दिया; मिसरी दास ने भागते सोनू को भाले से मारा, शेष ने लाठियों से पीटा।

विवाद्यक: प्रारम्भ में विधिपूर्ण जमाव किस क्षण विधि विरुद्ध बना?

निर्णय: दोषसिद्धि कायम रखी गई। जिस क्षण मोती दास ने हमले के लिए ललकारा और सदस्यों ने उसके आमंत्रण पर पीछा किया, उसी क्षण जमाव विधि विरुद्ध हो गया।

प्रतिपादित सिद्धांत: जमाव प्रारम्भ में विधिपूर्ण होते हुए भी सामान्य उद्देश्य (common object) अपराधी बनते ही विधि विरुद्ध हो जाता है; प्रत्येक सदस्य सामान्य उद्देश्य में किए गए अपराध के लिए रचनात्मक रूप से (constructively) उत्तरदायी होता है।


6. अध्याय 5 — चोरी, उद्दापन, लूट एवं डकैती (BNS धारा 303, 308, 309, 310)

संपत्ति के विरुद्ध अपराधों की यह शृंखला बढ़ती गंभीरता की एक सीढ़ी है:

 चोरी (303)                उद्दापन (308)
 बेईमानी से, सम्मति बिना,    भय दिखाकर संपत्ति
 चल संपत्ति हटाना            की सुपुर्दगी कराना
      │                        │
      └────────┬───────────────┘
               ▼  + तत्काल मृत्यु/उपहति/सदोष अवरोध का भय
           लूट (309)
               ▼  × 5 या अधिक व्यक्ति संयुक्ततः
           डकैती (310)
आधार चोरी (303) उद्दापन (308) लूट (309) डकैती (310)
संपत्ति केवल चल चल/अचल/मूल्यवान प्रतिभूति दोनों संभव दोनों
सम्मति बिना सम्मति भय से प्राप्त सम्मति अप्रासंगिक अप्रासंगिक
तत्व बेईमानी से हटाना क्षति के भय से सुपुर्दगी चोरी/उद्दापन + तत्काल भय/हिंसा लूट + 5 या अधिक व्यक्ति
दण्ड 3 वर्ष तक 7 वर्ष तक 10 वर्ष तक (कठोर) आजीवन या 10 वर्ष तक

चोरी/उद्दापन कब लूट बनते हैं: चोरी में — अपराधी चोरी करते समय स्वेच्छा से मृत्यु, उपहति या सदोष अवरोध अथवा इनका तत्काल भय कारित करे। उद्दापन में — अपराधी भय-ग्रस्त व्यक्ति के समक्ष उपस्थित होकर तत्काल भय दिखाकर तत्क्षण सुपुर्दगी कराए। उदाहरण: फोन झपटना — चोरी/छीनाझपटी (BNS 304, एक नया जोड़ा गया अपराध); चाकू दिखाकर फोन माँगना — लूट; 4 साथियों सहित (कुल 5) करना — डकैती।


7. अध्याय 6 — मानहानि (BNS धारा 356)

7.1 परिभाषा एवं तत्व

जो कोई बोले/पढ़े जाने के आशयित शब्दों, संकेतों या दृश्य-रूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के विषय में कोई लांछन इस आशय/ज्ञान से करे या प्रकाशित करे कि इससे उसकी ख्याति की अपहानि होगी — यह मानहानि है। तीन आवश्यक तत्व: लांछन → प्रकाशन (तीसरे व्यक्ति तक पहुँचना) → आशय/ज्ञान कि ख्याति गिरेगी।

7.2 दस अपवाद (प्रमुख)

सत्य लांछन जिसका प्रकाशन लोकहित में हो; लोक सेवक के सार्वजनिक आचरण पर सद्भावी राय; न्यायालयीन कार्यवाही की सही रिपोर्ट; लोक-कृति की सद्भावी समीक्षा; विधिपूर्ण प्राधिकार-धारक की सद्भावी परिनिन्दा; प्राधिकृत व्यक्ति के समक्ष सद्भावी अभियोग; हित-संरक्षा हेतु सद्भावी लांछन; सद्भावी चेतावनी।

दण्ड — 2 वर्ष तक सादा कारावास या जुर्माना या दोनों या सामुदायिक सेवा (यह BNS का नया दण्ड-प्रकार है)

🔴 लीडिंग केस : जे. जयललिता बनाम अर्काट एन. वीरास्वामी, AIR 1997 (मद्रास उच्च न्यायालय)

(2025 में परीक्षा में पूछा गया)

तथ्य: तमिलनाडु के मंत्री वीरास्वामी ने सार्वजनिक बयान दिया कि पूर्व मुख्यमंत्री जयललिता ने पूर्व मुख्य सचिव पर हमला करवाया ताकि "कोल डील केस" की फाइलें वापस ली जा सकें। जयललिता ने मुख्तारनामा-धारक के माध्यम से परिवाद दायर किया।

विवाद्यक: मुख्तारनामा-धारक द्वारा शपथ-कथन पर परिवाद की पोषणीयता।

निर्णय: निचली अदालत ने परिवाद खारिज किया (शपथ-कथन अविधिमान्य, सामग्री अपर्याप्त); उच्च न्यायालय स्तर पर आपराधिक मानहानि के परिवाद की प्रक्रियागत आवश्यकताओं पर महत्वपूर्ण विवेचना हुई।

प्रतिपादित सिद्धांत: मानहानि के परिवाद में व्यथित व्यक्ति द्वारा विधिवत परिवाद व सक्षम शपथ-कथन आवश्यक है; सार्वजनिक व्यक्तियों पर लांछन भी मानहानि की परिधि में आते हैं। (संबंधित: Subramanian Swamy v. UOI, 2016 — आपराधिक मानहानि संवैधानिक घोषित; प्रतिष्ठा अनुच्छेद 21 का अंग है।)


8. अध्याय 7 — प्रयत्न (BNS धारा 62) तथा BNS के नवीन प्रावधान

🔴 लीडिंग केस : State of Maharashtra v. Mohd. Yakub, (1980) 3 SCC 57

तथ्य: अभियुक्त चाँदी की सिल्लियाँ ट्रक/जीप में भरकर रात में सुनसान समुद्र-तट तक ले गए; पास में मोटरबोट की आवाज़ सुनाई दे रही थी; कस्टम अधिकारियों ने पकड़ लिया। बचाव पक्ष का तर्क था कि यह केवल "तैयारी" थी, तस्करी का प्रयत्न नहीं।

निर्णय: यह प्रयत्न है — तैयारी समाप्त हो चुकी थी और अपराध की ओर सन्निकट कार्य (proximate act) हो चुका था।

प्रतिपादित सिद्धांत: प्रयत्न = आशय + तैयारी के पश्चात अपराध की दिशा में प्रत्यक्ष कदम; कार्य ऐसा हो जो अपराध की ओर युक्तियुक्त रूप से सन्निकट (reasonably proximate) हो — यही "proximity rule" है।

BNS के नवीन प्रावधान (short note के लिए)

संगठित अपराध (धारा 111), आतंकवादी कृत्य (धारा 113), मॉब लिंचिंग — भीड़ द्वारा हत्या (धारा 103(2)), छीनाझपटी/Snatching (धारा 304), सामुदायिक सेवा दण्ड (धारा 4(f), 356 आदि में)। ध्यातव्य: जारता (Adultery) BNS में अपराध नहीं है (Joseph Shine v. UOI, 2018 के अनुसार)।


9. निष्कर्ष

भारतीय न्याय संहिता, 2023 ने IPC के आधारभूत सिद्धांतों को यथावत रखते हुए धारा-क्रमांक तार्किक रूप से पुनर्व्यवस्थित किए हैं तथा कुछ महत्वपूर्ण सुधार भी जोड़े हैं — व्यपहरण में लिंग-समानता (18 वर्ष), घोर उपहति की अवधि 20 से 15 दिन, सामुदायिक सेवा का नया दण्ड, तथा संगठित अपराध व मॉब लिंचिंग जैसे समकालीन अपराधों की सुस्पष्ट परिभाषा। रेग बनाम गोविन्दा, नानावटी, मोती दास एवं जयललिता जैसे वाद आज भी इन सिद्धांतों की न्यायिक व्याख्या के आधारस्तंभ हैं और नई संहिता के अंतर्गत भी समान रूप से प्रासंगिक हैं।


10. परीक्षा-दृष्टि तालिका (Exam Relevance Table)

अध्याय संभावित अंक विगत वर्षों में आया 2026 संभावना
मानव वध बनाम हत्या + Reg v. Govinda 16 2022, 2023 अत्यधिक (सबसे hot)
उपहति/घोर उपहति 16 2022, 2023 अत्यधिक (due)
व्यपहरण/अपहरण 16 2022, 2023 अत्यधिक (due)
विधि विरुद्ध जमाव + Moti Das 16 2025 मध्यम
चोरी-उद्दापन-लूट-डकैती 16 2022, 2023, 2025 (हर बार) अत्यधिक
मानहानि + Jayalalitha 16 2023, 2025 उच्च
नवीन प्रावधान (short note) 8-16 नई संहिता का दूसरा वर्ष उच्च
खण्ड-ब केस (Nanavati/Mohd. Yakub) 16 प्रश्न-सूची में, अभी नहीं पूछे गए उच्च